🕉️श्री हरिपुरुषाय नमः🌍🫂
Sumiru Saneh Sahit Sitapati Tulsidas
विनय पत्रिका Vinay Patrika 128
सुमिरु सनेह सहित सीतापति।
रामचरन तजि नहिँन आनि गति॥
रे मन! प्रेमके साथ श्रीजानकी-वल्लभ रामजी का स्मरण कर, क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों को छोड़कर तुझे और कहीं गति नहीं है॥
जप, तप, तीरथ, जोग समाधी।
कलिमति बिकल, न कछु निरुपाधी॥
जप, तप, तीर्थ, योगाभ्यास, समाधि आदि साधन हैं; परन्तु कलियुग में जीवों की बुद्धि स्थिर नहीं है इससे इन साधनों में से कोई भी विघ्नरहित नहीं रहा॥
करतहुँ सुकृत न पाप सिराहीं।
रकतबीज जिमि बाढ़त जाहीं॥
आज पुण्य करते भी (बुद्धि ठिकाने न होनेसे) पापों का नाश नहीं होता। रक्तबीज राक्षस की भाँति ये पाप तो बढ़ते ही जा रहे हैं। भाव यह है कि बुद्धि की विकलता से पाप में पुण्य-बुद्धि और पुण्य में पाप-बुद्धि हो रही है, इससे पुण्य करते भी पाप ही बढ़ रहे हैं।
हरति एक अघ-असुर- जालिका।
तुलसिदास प्रभु-कृपा-कालिका॥
हे तुलसीदास! इस पापरूपी राक्षसों के समूह को नाश तो केवल प्रभु की कृपारूपी कालिका जी ही करेंगी। (भगवत्कृपा की शरण लेने के सिवा अब अन्य किसी साधन से काम नहीं निकलेगा)