🕉️👌🏻🎯श्री हरिपुरुषाय नमः🌍🫂 

Achyutam Keshavan Ramnarayanam 

achyutashtkam आदिगुरु शंकराचार्य 


अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे॥१॥


हे अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ तथा जानकी नायक रामचन्द्रजी, मैं आपको भजता हूँ।


अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।

इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे॥२॥


हे अच्युत, केशव, सत्यभामापति, माधव, श्रीधर, राधिकाजी द्वारा आराधित, लक्ष्मीनिवास, सुन्दर, देवकीनन्दन और जो नंद को दिये जाने के फलस्वरूप उनके पुत्र हुए, आपको नमस्कार है।


विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये।

वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः॥३॥


जो विष्णु अर्थात् सर्वव्यापक है, जिष्णु अर्थात् सदा विजयी हैं, शंख-चक्रधारी है, रुक्मणीजी के परम प्रेमी है, जानकीजी जिनकी धर्मपत्नी हैं तथा जो गोपिकाओं द्वारा हृदय में पूजे जाते हैं, उन कंसविनाशक, मुरलीधर को मैं नमस्कार करता हूँ।


कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।

अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक॥४॥


हे कृष्ण! हे गोविन्द! हे राम! हे नारायण! हे लक्ष्मीपति! हे वासुदेव! हे अजेय! हे श्रीनिधि! हे अच्युत! हे अनन्त! हे माधव! हे अधोक्षज! हे द्वारिकानाथ! हे द्रौपदीरक्षक!


राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्य भूपुन्यताकारणः।

लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम्॥५॥


राक्षसों पर अति कुपित, श्री सीताजी से सुशोभित, दण्डकारण्य की भूमि को पवित्र करने वाले, श्री लक्ष्मणजी द्वारा अनुगत, वानरों से सेवित, श्री अगस्त्यजी से पूजित, राघव मेरी रक्षा करें।


धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्द्वेषिहा केशिहा कंसहृद्वंशिकावादक:।

पूतनाकोपक: सूरजाखेलनो बालगोपालक: पातु मां सर्वदा॥६॥


अनिष्ट करने आए धेनुक और अरिष्टक असुरों का ध्वंस करने वाले, केशी और कंस का वध करने वाले, वंशी बजाने वाले, पूतना पर कोप करने वाले और यमुनातट पर खेलने वाले बालगोपाल मेरी सदा रक्षा करें।


विद्युदुद्योतवत्प्रस्फ़ुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्।

वन्यया मालया शोभितरःस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे॥७॥


विद्युत्प्रकाश के सदृश जिनका पीताम्बर विभासित हो रहा है, वर्षाकालीन मेघों के समान जिनका अति शोभायमान शरीर है, जिनका वक्ष:स्थल वनमाला से विभूषित है और चरणयुगल अरुणवर्ण हैं, उन कमलनयन प्रभु को मैं भजता हूँ।


कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः।

हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे॥७॥


जिनका मुख घुंघराली अलकों से सुशोभित हो रहा है, जिनका मस्तक मणि से सुशोभित है, जिनके गालों पर चमकदार कुण्डल (बालियाँ) हैं, जो सुन्दर बाजूबन्द और उज्जवल कंकण से सुशोभित हैं और जिनके पास मधुर ध्वनि वाले पायल हैं, उन श्रीश्यामसुन्दर को मैं भजता हूँ।


अच्युतस्याष्टकं यः पथेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम्।

वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भरस्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम्॥


जो पुरुष इस सुन्दर छन्दयुक्त तथा मनोवांछित फलप्रदायक अच्युताष्टक का प्रतिदिन प्रेम तथा भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उस पर जगत् के सर्वव्यापी रचयिता श्रीहरि शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं।


॥इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितमच्युताष्टकं संपूर्णम्॥